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वाह्य व अन्तर

आवश्यक है संगीत सुन्दर हो,

पुलकित मन का अन्तर हो।

कोलाहल तो आक्रान्त करता है,

झूमे धरती गूँजता अम्बर हो।

#गयशिर

2 thoughts on “वाह्य व अन्तर”

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