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Some Lines:01पत्थरों की भीड़

बढ़ रही भीड़, बेजान पत्थरों की।

विकास की ख़ातिर, हत्या पेड़ों की।

टूट रहे पर्वत, उजड़ रही हरियाली।

ख़तरे में सल्तनत, जंगली शेरों की।।

1 thought on “Some Lines:01पत्थरों की भीड़”

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