Some Lines:01पत्थरों की भीड़

Share this…FacebookPinterestTwitterLinkedinबढ़ रही भीड़, बेजान पत्थरों की। विकास की ख़ातिर, हत्या पेड़ों की। टूट रहे पर्वत, उजड़ रही हरियाली। ख़तरे में सल्तनत, जंगली शेरों की।। Share this…FacebookPinterestTwitterLinkedin

event_note
close

Share this…FacebookPinterestTwitterLinkedinबढ़ रही भीड़, बेजान पत्थरों की। विकास की ख़ातिर, हत्या पेड़ों की। टूट रहे पर्वत, उजड़ रही हरियाली। ख़तरे में सल्तनत, जंगली शेरों की।। Share this…FacebookPinterestTwitterLinkedin

folder_open Some Lines
Read more